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शिव सूत्र : 1 - 7 जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः

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 जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः  [शिव सूत्र : 1 - 7]

यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का सातवां सूत्र है |

शाब्दिक अर्थ : जाग्रत अवस्था , स्वप्न अवस्था और सुषुप्त अवस्था के भेद को जो जान लेता है , वही तुर्यावस्था को भोग सकता है |
भावार्थ : साधारण मनुष्य केवल तीन अवस्थाओं को जानता है , जाग्रत अवस्था  (जागना), स्वप्नावस्था (जब हम स्वप्न देखते हैं ) और सुषुप्त अवस्था (जब हम गहरी नीद में होते हैं )| इस सूत्र में भगवान् शिव हमारी जागृति की चार अवस्थाएं बताते हैं | चौथी अवस्था केवल योगियों को ही ज्ञात होती है, जिसे तुर्यावस्था कहा जाता है | इस चौथी अवस्था को जानने के लिए आपको पहले की तीनो अवस्थाओं को समझना ज़रूरी है |
सामान्य जाग्रत अवस्था वो है जब हमें संसार का ज्ञान होता है किन्तु स्वयं का नहीं | इस अवस्था में हम शरीर के बाहर तो झाँक सकते हैं किन्तु अन्दर नहीं | ये अवस्था जाग्रत होते हुए भी हम उस स्वयं से अनभिज्ञ रह जाते हैं जो सबसे ज्यादा जानने योग्य है | इस अवस्था में हम जाग्रत होते हुए भी अपने मन और आत्मा से दूर रहते हैं और केवल व्यर्थ के संसार को सच मानते हैं, जो केवल माया है |
दूसरी अवस्था जिसे हम स्वप्नावस्था कहते हैं , इस में हम केवल बंद आँखों से संसार का प्रतिबिम्ब देख पाते हैं | इस अवस्था में हमारा मन हमें वो प्रतिबिम्ब दिखता है जो हम जाग्रत अवस्था में नहीं कर पाते | इस अवस्था में हमारा मन और मष्तिष्क हमें उन सब चीज़ों की अनुभूति करा सकता है, जिनकी हमने कामना करी हो | स्वप्न हमारे भय को भी विकराल रूप में दिखा सकते हैं , और हमें बिना पंखों के गगन में उड़ा भी सकते हैं | किन्तु इस अवस्था में भी हम स्वयं को जानने से चूक जाते हैं | इस अवस्था में भी संसार हमारा पीछा नहीं छोड़ता , और प्रतिबिम्ब रूप में हमें घेरे रहता है |
तीसरी अवस्था है सुषुप्त अवस्था , जिसमें हम सब चीज़ों को भूल कर केवल नींद में होते हैं | इस अवस्था में न तो हमें संस्सर का ज्ञान होता है, न संसार के प्रतिबिम्ब का और न स्वयं का |
इन तीनो अवस्थाओं में एक बात समान है, वो है स्वयं को न जाना |
इस स्तर पर कुछ लोग ये कह सकते हैं कि हम तो स्वयं को जानते हैं | उनका मत हो सकता है की ये मेरे हाथ हैं , ये मेरे पैर हैं , और इससे ज्यादा स्वयं को जानना क्या है | जो व्यक्ति ऐसा मत रखते हैं उनके लिए ये जानना आवश्यक है कि जो तुम्हारा है वो तुम नहीं हो | मेरा घर मैं नहीं हूँ , मेरे कपडे मैं नहीं हूँ , मेरा भोजन मैं नहीं हूँ , उसी प्रकार मेरा शरीर भी मैं नहीं हूँ | जो मेरा है वो मैं कैसे हो सकता हूँ | मैं तो आत्मा हूँ | तुर्यावस्था वो अवस्था है , जिसमें आपको उस स्वयं की अनुभूति होती है जो इस शरीर से भी परे है |
तुर्यावस्था वह सिद्ध अवस्था है जिसमें मनुष्य अपने आप को जानता है | सब योग और ध्यान उसी अवस्था को पाने के उपाय हैं | इस अवस्था में मनुष्य संसार के साथ-साथ स्वयं को भी जान लेता है, और उसे ये भी पता चल जाता है की इनमें से श्रेष्ठ क्या है | सामान्य जागृत अवस्था एक दीपक की तरह है जो आस पास की वस्तुओं को तो प्रकाशित कर सकती है लेकिन खुद दीपक के नीचे अँधेरा रहता है | तुर्यावस्था सूर्य की तरह है जो सभी दिशाओं को एक साथ प्रकाशित कर देता है |

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