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Showing posts with the label राजनीति

चुनावी खर्चा : भ्रष्टाचार का असली कारण !

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 आज के समय में राजनीति देश सेवा से ज्यादा एक career opportunity बन चुकी है, और हुनरमंद लोग इसकी शुरुआत student life यानि college time से ही कर देते हैं । उन्हें यह उसी समय से पता चल जाता है की एक नेता की ताकत क्या होती है । हम में से अधिकतर लोगों को अपने विद्यार्थी जीवन से ही पता होता है की वे कौन से students होते हैं, जो चुनावी राजनीति में कदम रखते हैं ।  उम्मीद है आप मेरा तात्पर्य समझ गए होंगे । यहाँ हम नैतिकता से अधिक आर्थिक मुद्दे पर बात करेंगे, क्योंकि जैसा हमने शुरू में कहा था की राजनीति एक career opportunity बन चुकी है ।  हम बात करेंगे लोक सभा की, क्योंकि यह वो सबसे बड़ा सदन हैं जहां जन प्रतिनिधि जनता द्वारा चुन कर भेजे जाते हैं । हमारे द्वारा एकत्र करी गई जानकारी के अनुसार एक लोकसभा सदस्य की मोटा-माती सैलरी होती है 1,00,000 प्रति माह , मतलब साल के 12 लाख, और 5 साल यानि पूरे tenure के 12 पंजे 60 लाख । आप सोचेंगे की सही रकम है ।  लेकिन अब हम बताते हैं बड़ी ही मज़दार बात ।  सन 2022 में चुनाव आयोग ने लोक सभा चुनाव में प्रत्याशियों (यानि candidates) द्वारा चुनाव...

धार्मिक दंगों का असली कारण !

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सभी धर्म शांति की शिक्षा देते हैं, फिर भी आज तक दुनिया में सबसे ज्यादा झगडे धर्म के नाम पर ही हुए हैं | ऐसा क्या है सभी धर्मों की शिक्षा में जो व्यक्ति धर्म के नाम पर एक-दूसरे की गर्दन काटने से भी नहीं कतराता |  धार्मिक श्रेष्ठता  सभी धर्मों के लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ समझते हैं, जो काफी हद तक उचित भी है | लेकिन यह श्रेष्ठता का भाव जब तक गर्व की सीमा तक है, तो सही है | किन्तु यदि यह श्रेष्ठता का भाव घमंड बन जाए तो बात बिगड़ जाती है | अपने धर्म पर गर्व यदि सीमा से अधिक हो जाए तो घमंड बन जाता है, जो दूसरे के धर्म को निम्न सिद्ध करना चाहता है | यह घमंड अपने भगवान् को सच्चा मानता है, और दूसरे के भगवान् को झूठ | धर्मान्तरण  दूसरे धर्म के लोगों को अपने धर्म में शामिल कराना "धर्मान्तरण" कहलाता है | मुस्लिम और इसाई धर्म में धर्मान्तरण को अच्छा व् सही माना जाता है , किन्तु हिन्दू धर्म में ऐसा नहीं है | यहीं से धार्मिक श्रेष्ठता सिद्ध करने की होड़ शुरू होती है | आप अपने धर्म को उच्च और दूसरे के धर्म को तुच्छ साबित करके ही किसी व्यक्ति को अपने धर्म में मिला सकते हैं | यहीं से धार्मिक ...

मंत्री पद की लालसा क्यों ?

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आज कल आप लोग अक्सर गठबंधन की सरकारें देखते हैं | कभी केंद्र में तो कभी राज्यों में | इसे भारतवर्ष का सौभाग्य ही कहिये की २०१४ में केंद्र में ऐसी सरकार आई जो बिना गठबंधन के, अपने बलबूते पे खड़ी हुई है. पर हर राज्य को तो ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सकता | जब भी हम कहीं गठबंधन की सरकार बनते हुए देखते हैं , तो पहले दलों की आपसी बातचीत का दौर चलता है | ये बातचीत आखिर होती किस बात पर है ? पुराने समय में तो ये बातें कब होती थी इसका मीडिया को पता भी नहीं चलता था | पर अब तो लोकतंत्र का सौभाग्य कहिये की मीडिया हमें पहले ही बता देता है की किस दल को कौनसे पद की लालसा है | सब दल बैठ के सबसे बड़े दल के नेता के सामने अपनी मंत्रिपद की सूची रख देते हैं , और कहते हैं की इससे कम पे हम समर्थन नहीं देंगे | अब बेचारा बड़े दल का नेता मजबूर सा साथी दलों के बीच मंत्रीपदों का बटवारा करता है | हालांकि कुछ पद वो अपने नेताओं के लिए भी बचाता है | आपको क्या लगता है ? क्या मंत्रिपद के लालच से समर्थन देने वाले दल , या मंत्री पद का लालच दिखाकर समर्थन लेने वाले दल सही काम कर रहे हैं ? मेरे हिसाब से तो ये सरासर भ्रष्...

वोट डालने से पहले अवश्य पढ़ें

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आज के समय की सबसे बड़ी व्यथा यह है की आप Online Shopping करने से पहले एक जैसे दिखने वाले चार products को compare करते हो, फिर reviews पढने के बाद COD वाला order place करते हो | किन्तु !!!!! चुनाव के समय नेता का चुनाव करने से पहले आप उन नेताओं को compare नहीं कर सकते, जिनमें से कोई एक अगले पांच साल तक विधानसभा या लोकसभा में आपकी नुमाइंदगी करेगा | वैसे आज के डिजिटल युग में कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, लेकिन फिर भी इन नेताओं से सम्बंधित जानकारियां जुटाना इतना भी सरल नहीं है | नेताओं को compare करना तो काफी टेढ़ी खीर है | Election Commission की वेबसाइट पर आप अपने क्षेत्र के सभी प्रत्याशियों का affidavit देख सकते हैं, जो वे अपने हाथ से भर कर जमा करते हैं | यदि आप इन affidavits को एक-एक करके पढ़ते हैं तो काफी ज्यादा समय लगता है , क्योंकि हर affidavit लगभग १५ पन्नों की एक PDF फाइल के रूप में होता है | अब यदि आपको अपने क्षेत्र के दस उम्मीदवारों के बारे में जानना है तो आपको लगभग 150 पन्नों की किताब पढनी पड़ेगी, और compare यानि "तुलना" करने में जो समय लगेगा सो अलग |  ये तथ्य जानते हुए भी मैंने...

भारतीय धर्मनिर्पेक्षता : एक राजनितिक छल

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धर्मनिर्पेक्षता (Secularism), भारत में इस्तेमाल होने वाला एक ऐसा शब्द बन गया है जिसका उपयोग किसी की भलाई के लिए कम, राजनितिक दलों के इस्तेमाल के लिए ज्यादा हुआ है | यदि आप भारतीय धर्मनिर्पेक्षता के बारे में ज्यादा जानकारी एकत्र करेंगे तो पाएंगे की ये वास्तव में धर्मनिर्पेक्षता है ही नहीं | भारतीय संविधान में धर्मनिर्पेक्षता को एक कानून के रूप में ठीक से लागू किया ही नहीं गया, न ही इसकी कोई सही परिभाषा लिखी गयी | Wikipedia पर Secularism in India नामक एक लेख में ये बात सही तरीके से बताई गयी है | वहां नीचे दी गयी पंक्ति हुबहू लिखी गयी है | "Neither India's constitution nor its laws define the relationship between religion and state." "Religious laws in personal domain, particularly for Muslim Indians, supersede parliamentary laws in India; and currently, in some situations such as religious indoctrination schools the state partially finances certain religious schools. These differences have led a number of scholars[8][30][31] to declare that India is not a secular ...

क्या हमारे देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करना सही होगा ?

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"इंडिया" नाम हमारे देश को ब्रिटिश शासकों ने दिया | कुछ लोग इसे "सिन्धु घाटी सभ्यता" से जोड़ते हैं , क्योंकि अंग्रेजी में उसे "इंडस वैली सिविलाइज़ेशन" (Indus Valley Civilization) कहते हैं , और "इंडस" शब्द से "इंडिया" शब्द तक पंहुचा जा सकता है | लेकिन असली मुद्दा ये है की जिस देश के 2% से भी कम लोग ही सही तरीके से अंग्रेजी बोल पाते हों , क्या उस देश का नाम अंग्रेजी में होना सही है | हमारे देश का हिंदी नाम "भारत" है , जिसका अपना एक अर्थ है , एक महत्व है , जो आपको इस लेख को पढ़ कर पता चलेगा | इंडिया और इंडियन का शाब्दिक अर्थ क्या है ? ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी को अंग्रेजी भाषा का सबसे बढ़िया शब्दकोष माना जाता है | सन 1900 की Oxford Dictionary के प्रष्ठ 789 में "India" और "Indian" शब्द का अर्थ "Poor - Old fashioned - Criminal people" अर्थात "गरीब -पुराने विचारों वाले -अपराधी" है | ब्रिटिश राज में खास जगहों से भारतियों को वर्जित रखने के लिए "Dogs and Indians are Not Allowed" लिख कर बोर्ड लग...

NOTA : सही या गलत ? मर्ज़ी है आपकी !

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इस लोकसभा चुनाव में "NOTA" अर्थात "None of the Above" (इनमें से कोई नहीं) का बटन दबाने के बारे में देश में गहन विचार विमर्श चल रहा है | जनता जागरूक हो रही है , और किसी ऐसे नेता को चुनना नहीं चाहती जो गलत हो | किन्तु NOTA का बटन दबा कर क्या हम वाकई ऐसा करने में सफल होते हैं ? इस सवाल का जवाब जरा समझने वाला है | NOTA का इस्तेमाल अक्सर वो वर्ग करता है , जो समझदार है या फिर खुद को समझदार समझता है | ऐसा इसलिए क्योंकि उस समझदार वोटर ने यह तो जांच लिया की कोई भी उम्मीदवार उस के वोट के लायक नहीं, किन्तु साथ ही उसने अपने वोट को व्यर्थ करने का भी पूरा बंदोबस्त कर लिया | NOTA को वोट करने का फायदा तब होता है जब सबसे ज्यादा वोट NOTA को मिलें , किन्तु ऐसा होने के आसार बहुत ही कम होते हैं | इसलिए अक्सर NOTA को दिया हुआ वोट , वोट न देने के बराबर ही हो जाता है | राजनीति में सौ प्रतिशत शुद्ध व्यक्ति मिलना बहुत मुश्किल है | यदि आप ये सोचते हों की अटल बिहारी या लाल बहादुर शास्त्री जैसे व्यक्ति आपके क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे , तो आपको शायद निराशा हाथ लगे | वह जमाना और था, आज राजनीति एक...