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शिव सूत्र : संस्कृत से हिंदी भावार्थ सहित (Shiv Sutra Hindi Translation)

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शिव सूत्र
कुछ ऐसे सूत्रों का संकलन है जो हमें आध्यात्मिक ज्ञान की उस उंचाई से अवगत कराती है , जो शायद भगवद गीता जैसे महाकाव्यों में ही मिलती है | शिव सूत्र की रचना ऋषि वासुगुप्त ने नवी शताब्दी में कश्मीर के महादेव पर्वत के निकट की थी | कहा जाता है की किसी सिद्ध पुरुष या स्वयं भगवान् शिव ने उनके स्वप्न में आकर ये सूत्र उनको बताये थे | कुछ विद्वानों का ये भी मानना है की भगवान् शिव ने ऋषि वासुगुप्त को एक चट्टान के बारे में बताया था जिस पर ये सभी सूत्र लिखे हुए थे | उस चट्टान का नाम शंकरोपला है, जिसके दर्शन करने लोग आज भी जाते हैं | हालाँकि अब उस चट्टान पर वे सूत्र नहीं दिखते | शिव सूत्र को माहेश्वर सूत्राणि के नाम से भी जाना जाता है |
सूत्र अक्सर छोटे होते हैं, इसीलिये इन्हें सूत्र कहते हैं | किन्तु इन सूत्रों को केवल एक छोटा वाक्य समझने की भूल मत करना, क्योंकि हर सूत्र बहुत गहरा है | इनका शाब्दिक अर्थ चाहे छोटा लगे किन्तु भावार्थ बड़ा है | हर सूत्र का शब्दार्थ एक हो सकता है , किन्तु हर ज्ञानी पुरुष अपनी बुद्धिमत्ता और भाव के अनुसार अलग अलग भावार्थ तक पहुच सकता है | भावार्थ भाव से उत्त्पन्न होता है , शब्दकोष से नहीं | एक शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं , लेकिन ये आपके भाव पर निर्भर करता है कि आप किस अर्थ को सही समझें | सूत्र में आयतन कम होता है , और घनत्व अधिक | इसलिए एक सूत्र की व्याख्या करने के लिए एक दिन भी कम पड़ सकता है | हर सूत्र एक बीज है , किसी को उसमें एक वृक्ष दिख सकता है और किसी को नहीं |
शिव सूत्र को वैदिक संस्कृत भाषा में लिखा गया था जिसका ज्ञान आज बहुत कम व्यक्तियों को है | इन सूत्रों का अर्थ आपको समझाने के लिए इनका संस्कृत से हिंदी संवाद इस पेज पर दिया गया है | शिव सूत्र में कुल ३ अध्याय और ७७ सूत्र हैं|

शिव सूत्र


- शाम्भवोपाय

चैतन्यमात्मा । १-१। - अर्थ 
ज्ञानं बन्धः । १-२। अर्थ 
योनिवर्गः कलाशरीरम् । १-३। अर्थ 
ज्ञानाधिष्ठानं मातृका । १-४। अर्थ
उद्यमो भैरवः । १-५। अर्थ 
शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः । १-६। अर्थ 
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः । १-७। अर्थ 
ज्ञानं जाग्रत् । १-८।
स्वप्नो विकल्पाः । १-९।
अविवेको मायासौषुप्तम् । १-१०।
त्रितयभोक्ता वीरेशः । १-११।
विस्मयो योगभूमिकाः । १-१२।
इच्छा शक्तिरुमा कुमारी । १-१३।
दृश्यं शरीरम् । १-१४।
हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम् । १-१५।
शुद्धतत्त्वसन्धानाद् वा अपशुशक्तिः । १-१६।
वितर्क आत्मज्ञानम् । १-१७।
लोकानन्दः समाधिसुखम् । १-१८।
 शक्तिसन्धाने शरीरोत्पत्तिः । १-१९।
भूतसन्धान भूतपृथक्त्व विश्वसंघट्टाः । १-२०।
शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्व सिद्धिः । १-२१।
महाह्रदानुसन्धानान्मन्त्रवीर्यानुभवः । १-२२।

२- शाक्तोपाय

चित्तं मन्त्रः । २-१।
प्रयत्नः साधकः । २-२।
विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् । २-३।
गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्ट विद्यास्वप्नः । २-४।
विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था । २-५।
गुरुरुपायः । २-६।
मातृकाचक्रसम्बोधः । २-७।
शरीरं हविः । २-८।
ज्ञानं अन्नम् । २-९।
विद्यासंहारे तदुत्थ स्वप्न दर्शनम् । २-१०।

३- आणवोपाय

आत्मा चित्तम् । ३-१।
ज्ञानं बन्धः । ३-२।
कलादीनां तत्त्वानां अविवेको माया । ३-३।
शरीरे संहारः कलानाम् । ३-४।
नाडी संहार भूतजय भूतकैवल्य भूतपृथक्त्वानि । ३-५।
मोहावरणात् सिद्धिः मोहावरणात् । ३-६।
मोहजयाद् अनन्ताभोगात् सहजविद्याजयः अनन्ताभोगात् । ३-७।
जाग्रद् द्वितीयकरः । ३-८।
नर्तक आत्मा । ३-९।
रङ्गोऽन्तरात्मा । ३-१०।
प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि । ३-११।
धीवशात् सत्त्वसिद्धिः धीवशात् । ३-१२।
सिद्धः स्वतन्त्रभावः । ३-१३।
यथा तत्र तथान्यत्र । ३-१४।
विसर्गस्वाभाव्याद् अबहिः स्थितेस्तत्स्थितिः । ३-१५।
बीजावधानम् । ३-१६।
आसनस्थः सुखं ह्रदे निमज्जति । ३-१७।
स्वमात्रा निर्माणं आपादयति । ३-१८।
विद्या अविनाशे जन्म विनाशः । ३-१९।
कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः । ३-२०।
त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम् । ३-२१।
मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत् । ३-२२।
प्राण समाचारे समदर्शनम् । ३-२३।
मध्येऽवर प्रसवः । ३-२४।
मात्रास्वप्रत्यय सन्धाने नष्टस्य पुनरुत्थानम् । ३-२५।
शिवतुल्यो जायते । ३-२६।
शरीरवृत्तिर्व्रतम् । ३-२७।
कथा जपः । ३-२८।
दानं आत्मज्ञानम् । ३-२९।
योऽविपस्थो ज्ञाहेतुश्च । ३-३०।
स्वशक्ति प्रचयोऽस्य विश्वम् । ३-३१।
स्तिथिलयौ । ३-३२।
तत् प्रवृत्तावप्यनिरासःतत् प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् । ३-३३।
सुख दुःखयोर्बहिर्मननम् । ३-३४।
तद्विमुक्तस्तु केवली । ३-३५।
मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा । ३-३६।
भेद तिरस्कारे सर्गान्तर कर्मत्वम् । ३-३७।
करणशक्तिः स्वतोऽनुभवात् । ३-३८।
त्रिपदाद्यनुप्राणनम् । ३-३९।
चित्तस्थितिवत् शरीर चित्तस्थितिवत् करण बाह्येषु । ३-४०।
अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य । ३-४१।
तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः । ३-४२।
भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । ३-४३।
नैसर्गिकः प्राणसंबन्धः । ३-४४।
नासिकान्तर्मध्य संयमात् किमत्र संयमात् सव्यापसव्य सौषुम्नेषु । ३-४५।
भूयः स्यात् प्रतिमीलनम् । ३-४६।
ॐ तत् सत्

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