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Showing posts from February, 2022

क्या आप गलत तरीके से सांस ले रहे हैं ?

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हमारा सांस लेने का गलत तरीका हमारे तनाव में रहने का एक मुख्य कारण है ।  हम "6-pack-abs" के युग में रह रहे हैं, जहां आपके पेट की muscles को दिखाना आपकी fitness का प्रमाण है। Fitness freak, विशेष रूप से पुरुष, अपने पेट को अंदर खींचते हैं और अपनी छाती को बड़ा दिखाने के लिए सांस लेते हैं। Fitness के इन तथाकथित प्रमाणों ने हमारे सांस लेने के तरीके को बदल दिया है । यह वयस्कों में बढ़ती चिंता और तनाव (stress and anxiety) के पीछे एक प्रमुख कारण है। कौनसी Muscles हमें सांस लेने में मदद करती हैं ? सांस लेना केवल Lungs (फेफड़ों) का फैलना और सिकुड़ना नहीं है । इस प्रक्रिया में हमारी muscles (मांसपेशियों) का काफी बड़ा योगदान होता है । हमारे diaphragm, abdomen और पसलियों के बीच की muscles, सांस लेने में लगने वाले जोर का 80% भार वहन करती हैं । बाकी का 20% भार हमारे कंधे, गर्दन और उपरी छाती की muscles अपने ऊपर लेती हैं । गलत तरीके से सांस लेने से हम तनाव में कैसे आ जाते हैं ? कुछ लोगों का यह मानना है की हमारी कमर बिलकुल पतली होनी चाहिए और साथ ही पेट की muscles (6-pack-abs) भी दिखनी चाहिए । यह मा...

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You must have received such messages in your message box. Different languages are used to make people forward such messages. Some of these messages ask you to forward it to at least 10 people. People usually don't know why they read such messages and why they forward them. Some of these messages utilize the greed in the mind of reader, while some of them use the "fear of God" to make people forward them. Why do people write and send such messages ? To popularize a religion. To make people fearful of God. Both of the above motives can be easily understood but the truth is that the sender of such messages neither know the religion properly nor the God. According to me, originator of such messages needs some kind of treatment from a psychiatrist. Why you should not forward such messages ? You should not forward such messages because it shows that either you are greedy or fearful. Being greedy is not a bad thing, as long as it gives you motivation to do something go...

शिव सूत्र : 1 - 7 जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः

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  जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः   [ शिव सूत्र : 1 - 7] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का सातवां सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  :  जाग्रत  अवस्था ,  स्वप्न  अवस्था और  सुषुप्त  अवस्था के भेद को जो जान लेता है , वही  तुर्यावस्था  को भोग सकता है | भावार्थ  : साधारण मनुष्य केवल तीन अवस्थाओं को जानता है , जाग्रत अवस्था  (जागना), स्वप्नावस्था (जब हम स्वप्न देखते हैं ) और सुषुप्त अवस्था (जब हम गहरी नीद में होते हैं )| इस सूत्र में भगवान् शिव हमारी जागृति की चार अवस्थाएं बताते हैं | चौथी अवस्था केवल योगियों को ही ज्ञात होती है, जिसे तुर्यावस्था कहा जाता है | इस चौथी अवस्था को जानने के लिए आपको पहले की तीनो अवस्थाओं को समझना ज़रूरी है | सामान्य  जाग्रत अवस्था  वो है जब हमें संसार का ज्ञान होता है किन्तु स्वयं का नहीं | इस अवस्था में हम शरीर के बाहर तो झाँक सकते हैं किन्तु अन्दर नहीं | ये अवस्था जाग्रत होते हुए भी हम उस स्वयं से अनभिज्ञ रह जाते हैं जो सबसे ज्यादा जानने योग्य है | इस अवस्था में हम जाग्रत होते हुए भी अपने ...

शिव सूत्र : 1 - 6 शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः

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  शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः   [ शिव सूत्र : 1 - 6] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का छठा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  :  शक्ति  अर्थात शिव का वो अभिन्न हिस्सा जो इस जगत को चला रहा है | चक्र  अर्थात एक गोला |  संधान  शब्द के कई अर्थ हैं जैसे धनुष पर बाण चढ़ाना , निशाना लगाना या मिलाना |  विश्वसंहारः  अर्थात इस संसार का संहार या अंत | भावार्थ  : समस्त जगत की शक्ति जो शिव का ही एक अभिन्न अंग है और इस जगत को स्वरुप प्रदान किये हुए है, जब वह समस्त शक्तिचक्र एक जगह इकठ्ठा होता है , तब जगत का संहार होता है | शिव का कार्य ही संहार है | जो भी चीज़ उत्त्पन्न हुई है , उसका संहार भी अवश्यम्भावी है | ये समस्त ब्रह्माण्ड भी इसी नियम से बंधा हुआ है | शिव इसका भी संहार करते है | समस्त ब्रह्माण्ड शिव की शक्ति का ही विस्तार है , जब ये समस्त शक्ति एक चक्र बना कर इकट्ठी होती है , तब विश्व का संहार होता है | इस के अलावा इस सूत्र का एक और भाव भी है | हमारे शरीर में भी कुछ चक्र होते हैं जिन्हें योग के माध्यम से जाग्रत किया जा सकता है | ये चक्र न सिर्फ शक्ति क...

शिव सूत्र : 1 - 5 उद्यमो भैरवः

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  उद्यमो भैरवः   [ शिव सूत्र : 1 - 5] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का पांचवा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  :  उद्यम  अर्थात एक सार्थक प्रयास |  भैरव  - शिव का एक रूप जो अत्यंत भयानक है | इस सूत्र का शाब्दिक अर्थ यह है की एक आध्यात्मिक सार्थक प्रयास से ही हम भैरव स्वरुप को समझ सकते हैं | भावार्थ  : शिव सूत्र का हर सूत्र अपने से पिछले और अगले सूत्र से जुड़ा हुआ है | पिछले सूत्र में ये बताया गया था की यह सांसारिक ज्ञान केवल स्वर है, जो हमें जीवन भर अपने नियंत्रण में रखता है | इस सूत्र में थोडा आगे बढ़कर एक सार्थक प्रयास करने की बात कही गयी है , जिससे हम इस माया से मुक्त हो कर उस भैरव स्वरुप को जान सकें | भैरव संहार करते हैं | इसीलिये शिव को काल भैरव भी कहा गया है | वे संहार के देवता हैं | हर जीव और वस्तु की एक आयु है , उसके बाद उसकी मृत्यु या संहार निश्चित है | जो इस मृत्यु को समझ गया , उस भैरव को समझ गया , वही सांसारिक ज्ञान (जो माया है ) से मुक्त हो सकता है | उस भैरव का जानना इतना सरल भी नहीं है | जो सार्थक प्रयास इस भैरव को जानने के लिए करना पड़ता है , व...

शिव सूत्र : 1 - 4 ज्ञानाधिष्ठानं मातृका

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  ज्ञानाधिष्ठानं मातृका   [ शिव सूत्र : 1 - 4] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का चौथा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  :  ज्ञान  अर्थात सांसारिक वस्तुओं की जानकारी जिसकी एक सीमा है |  अधिष्ठानं  का अर्थ जिसके अधीन रह कर कोई कार्य किया जाए |  मातृका  शब्द के कई अर्थ हैं - जननी, सौतेली माँ, माँ जैसी, ठोड़ी की आठ विशिष्ट नसें , स्वर और संस्कृत भाषा (जो सब भाषाओँ की जननी है ) | संसार में प्राप्त ज्ञान ही हमें अपने अधीन रखता है , और वही हमारे मुख से भाषा के माध्यम से निकलता है | भावार्थ  : हम जब से इस संसार में जन्म लेते हैं केवल इस संसार का ही ज्ञान प्राप्त करते हैं | हम सभी जाने अनजाने इस ज्ञान के अधीन अपना जीवन व्यतीत करते हैं | यही ज्ञान शब्दों के माध्यम से हमारे मुख से निकलता है | ज्ञानाधिष्ठानं  का अर्थ बड़ा गहरा है, हमारा ज्ञान ही हमारे सभी कर्मों का स्रोत है| यह ज्ञान ही हमारा आधार है, यही हमें अपने वशीभूत रखता है , और हम इस भ्रम में जीते हैं की हम स्वतन्त्र हैं | सांसारिक ज्ञान की एक सीमा है | संसार का कोई भी ज्ञान शिव को व्यक्त करने में अ...

शिव सूत्र : 1 - 3 योनिवर्गः कलाशरीरम्

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योनिवर्गः कलाशरीरम्   [ शिव सूत्र : 1 - 3] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का तीसरा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  : योनि अर्थात वो स्रोत जिससे हम उपजे हैं | वर्ग अर्थात समाज या प्रकृति का एक हिस्सा | कला अर्थात कर्ता का भाव | शरीर अर्थात ये देह | हमारे मन में पल रहा करता का भाव ही हमें अलग अलग प्रकार के शरीर और योनियों में भेजता है | भावार्थ  : यह सूत्र बहुत गहरा है | अक्सर लोग वर्ग शब्द आने पर समाजिक वर्गों से आगे नहीं बढ़ पाते | किन्तु शिव की द्रष्टि बहुत गहरी है | योनी का अर्थ प्रकृति या स्त्री भी होता है | योनी शब्द का उपयोग केवल मनुष्यों के लिए नहीं बल्कि किसी भी जीव के लिए हो सकता है | कलाशरीरम्  अर्थात "हमारे मन का करता का भाव" ही हमें शरीर की प्राप्ति कराता है | हमारा मन जिस चीज़ को पाने को लालायित रहता है , हम उसी के अनुरूप शरीर पाने की तरफ अग्रसर हो जाते हैं | प्रकृति तो योनी है, वह गर्भ है ,  हमारी इच्छा (हमारे करता भाव ) के अनुरूप हमें शरीर प्रदान करती है | इस सूत्र को यदि हम गहराई से समझें तो हम अपने दुखों के लिए कभी किसी दूसरे को दोषी नहीं बनायेंगे | ह...

शिव सूत्र : 1 - 2 ज्ञानं बन्धः

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ज्ञानं बन्धः [ शिव सूत्र : 1 - 2] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का दूसरा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ : ज्ञान बंधन है | भावार्थ : इस सूत्र में भगवान् शिव ज्ञान को एक प्रकार का बंधन बता रहे हैं | ज्ञान भौतिक भी होता है और अध्यात्मिक भी | यहाँ भौतिक ज्ञान को बंधन बताया गया गया है | यह भौतिक ज्ञान जिसे हम विशेष-ज्ञान या विज्ञान समझते है, एक प्रकार का बंधन है, जो हमें अपनी वास्तविकता (हमारी आत्मा ) को जानने से रोकता है | एक साधारण मनुष्य समझता है की विज्ञान को समझ कर वो सम्पूर्ण सृष्टि को समझ सकता है , जो केवल एक भ्रम है | ये वैसा ही है की कोई पुरुष किसी स्त्री के शरीर की पूरी जानकारी एकत्र कर के, या उसके शरीर के साथ सम्बन्ध स्थापित करके ये सोचे की उसने उसे पा लिया | जबकि पाने का असली अर्थ तो उसके प्रेम को पाना है | शरीर तो एक बलात्कारी भी पा लेता है , किन्तु प्रेम नहीं | इसी प्रकार ज्ञान हमें इस सृष्टि के चलने के नियम बता सकता है, ग्रुत्वाकर्षण और अनंत ब्रह्माण्ड की तसवीरें दिखा सकता है, किन्तु उस सृष्टा से जो हमारी आत्मा में बसा हुआ है, उस से अवगत नहीं करा सकता | भौतिक ज्ञान हमें Extro...

शिव सूत्र : 1 - 1 चैतन्यमात्मा

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  चैतन्यमात्मा   [ शिव सूत्र 1 - 1 ] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का प्रथम सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  : चैतन्य ही आत्मा है | चैतन्य अर्थात हमारे मन की जाग्रत अवस्था | भावार्थ  : इस सूत्र में भगवान शिव ने आत्मा शब्द का अर्थ बताया है | ज्यादातर हिन्दू इस तथ्य से अवगत हैं की हमारे शारीर के भीतर एक आत्मा विद्यमान है | किन्तु उस आत्मा को जानने का अवसर कुछ जाग्रत मनुष्यों को ही मिलता है | एक साधारण मनुष्य केवल अपने मन और शरीर से ही बंधा रहता है | हमारा मन हमें वासनाओ से ग्रसित रखता है | ये वासना किसी वस्तु को पाने की , किसी का प्यार पाने की , किसी का शरीर पाने की या किसी अन्य भौतिक सुख को पाने की हो सकती है | हमारा मन ही हमें हमारी आत्मा तक पहुचने से रोकता है , क्योंकि वो जाग्रत अवस्था जिसमें हमें हमारी आत्मा की अनुभूति होती है , वो अवस्था हमारे मन के पार जा कर ही हो सकती है | आसन शब्दों में, हमारी आत्मा हमारे मन का ही जाग्रत स्वरुप है | जब एक व्यक्ति जाग्रत अवस्था में पहुचता है, तो उसका मन उसे नहीं चला सकता , बल्कि उसका मन उसके अनुसार चलता है | जाग्रत होने के पश्चात् हमारा...

शिव सूत्र : संस्कृत से हिंदी भावार्थ सहित (Shiv Sutra Hindi Translation)

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शिव सूत्र कुछ ऐसे सूत्रों का संकलन है जो हमें आध्यात्मिक ज्ञान की उस उंचाई से अवगत कराती है , जो शायद भगवद गीता जैसे महाकाव्यों में ही मिलती है | शिव सूत्र की रचना ऋषि वासुगुप्त ने नवी शताब्दी में कश्मीर के महादेव पर्वत के निकट की थी | कहा जाता है की किसी सिद्ध पुरुष या स्वयं भगवान् शिव ने उनके स्वप्न में आकर ये सूत्र उनको बताये थे | कुछ विद्वानों का ये भी मानना है की भगवान् शिव ने ऋषि वासुगुप्त को एक चट्टान के बारे में बताया था जिस पर ये सभी सूत्र लिखे हुए थे | उस चट्टान का नाम शंकरोपला है, जिसके दर्शन करने लोग आज भी जाते हैं | हालाँकि अब उस चट्टान पर वे सूत्र नहीं दिखते | शिव सूत्र को माहेश्वर सूत्राणि के नाम से भी जाना जाता है | सूत्र अक्सर छोटे होते हैं, इसीलिये इन्हें सूत्र कहते हैं | किन्तु इन सूत्रों को केवल एक छोटा वाक्य समझने की भूल मत करना, क्योंकि हर सूत्र बहुत गहरा है | इनका शाब्दिक अर्थ चाहे छोटा लगे किन्तु भावार्थ बड़ा है | हर सूत्र का शब्दार्थ एक हो सकता है , किन्तु हर ज्ञानी पुरुष अपनी बुद्धिमत्ता और भाव के अनुसार अलग अलग भावार्थ तक पहुच सकता है | भावार्थ भाव से उ...

मंत्री पद की लालसा क्यों ?

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आज कल आप लोग अक्सर गठबंधन की सरकारें देखते हैं | कभी केंद्र में तो कभी राज्यों में | इसे भारतवर्ष का सौभाग्य ही कहिये की २०१४ में केंद्र में ऐसी सरकार आई जो बिना गठबंधन के, अपने बलबूते पे खड़ी हुई है. पर हर राज्य को तो ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सकता | जब भी हम कहीं गठबंधन की सरकार बनते हुए देखते हैं , तो पहले दलों की आपसी बातचीत का दौर चलता है | ये बातचीत आखिर होती किस बात पर है ? पुराने समय में तो ये बातें कब होती थी इसका मीडिया को पता भी नहीं चलता था | पर अब तो लोकतंत्र का सौभाग्य कहिये की मीडिया हमें पहले ही बता देता है की किस दल को कौनसे पद की लालसा है | सब दल बैठ के सबसे बड़े दल के नेता के सामने अपनी मंत्रिपद की सूची रख देते हैं , और कहते हैं की इससे कम पे हम समर्थन नहीं देंगे | अब बेचारा बड़े दल का नेता मजबूर सा साथी दलों के बीच मंत्रीपदों का बटवारा करता है | हालांकि कुछ पद वो अपने नेताओं के लिए भी बचाता है | आपको क्या लगता है ? क्या मंत्रिपद के लालच से समर्थन देने वाले दल , या मंत्री पद का लालच दिखाकर समर्थन लेने वाले दल सही काम कर रहे हैं ? मेरे हिसाब से तो ये सरासर भ्रष्...

धुम्रपान और शराब को बढ़ावा क्यों ?

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आज के दौर में हमारी नौजवान पीढ़ी को जो चीज़ सबसे ज्यादा बीमार और लाचार बना रही है, वो चीज़ है शराब और धुम्रपान | हमारी सरकारें एक तरफ तो शराब और सिगरेट के पैकेट्स पे वैधानिक चेतावनी लिखवाती हैं और दूसरी तरफ हमारा फिल्म सेंसर बोर्ड ऐसे गानों को पास करता है जो धुम्रपान और शराब को बढ़ावा देते हैं | "चार बोतल वोडका" और "मैं अल्कोहलिक हूँ" , ये दो ऐसे गाने हैं जो पूरी तरह शराब के ऊपर ही हैं , एक एक पंक्ति शराब के ऊपर | पर कोई  फर्क नहीं पड़ता | जिसे सुनना हो सुने , जिसे न सुनना हो न सुने (आख़िरकार ये एक आज़ाद मुल्क है) | पर हमारी सरकार को इसे ठन्डे बसते में नहीं डालना चाहिए | ये चीज़ें सिर्फ इन्हें पीने वालों को खतरे में नहीं डालती बल्कि उन लोगों को भी डालती हैं जो अनजाने में इनका शिकार होते हैं | एक बीडी-सिगरेट पीने वाला इंसान घर के बाहर सिगरेट नहीं पीता , क्योंकि वहां रोक है | पर घर लोटते ही वो सारी कसर पूरी करता है | घर में उसके परिवार के अन्य सदस्य भी उस धुएं का शिकार होते हैं , खास तौर पे बच्चे और बूढ़े | उन बच्चों और बूढों को कौन बचाएगा | खुद पीने वाला तो बचाएगा नही...

जब धर्म एक धंधा बन जाए, तब क्या होता है

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आज हमारे समाज में धर्म को धर्म ना मान कर, एक दूकान की तरह बना दिया है | लोग ये भूल ही गए हैं कि धर्म का उद्देश्य क्या है | हर कोई धर्म के तवे पे अपनी रोटी सकने पे लगा है | कभी आसाराम का भेद खुलता है, तो कभी रामपाल का | हमारे भारत में भक्ति भावना लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई है | अगर भक्ति सिर्फ परमात्मा की हो तो ठीक है , लकिन जब ही भक्ति अपना मार्ग बदल कर कुछ ऐसे लोगों की हो जाती है जो खुद को भगवान् बताते हैं तब ये अंध-भक्ति हो जाती है | भक्ति बुरी नहीं है, पर अंधभक्ति बुरी है | हम ही हैं जो ऐसे इंसानों को भगवान् बनने देते हैं | आमतौर पर हम भगवान उसे मानते हैं जो हमारी मनोकामना पूरी कर दे | हम धर्म या भगवान की शरण में सिर्फ इसलिए जाते हैं, जिससे हम कुछ मांग सकें | इस मांगने के बदले में हम कुछ न कुछ चढ़ावा भी चढाने से कतराते नहीं हैं | चढ़ावा भी हम ये सोच कर चढाते हैं की हम तो दान कर रहे हैं | पर असलियत में आप दान नहीं दे रहे हैं , आप भगवान् से सौदा कर रहे हैं | जितनी बड़ी मनोकामना , उतना बड़ा दान | और ये काम सिर्फ अनपढ़ ही नहीं , पढ़े लिखे भी करते हैं | हमारी इसी आदत ने कुछ चतुर लोगों को ...

आरक्षण - सही या ग़लत

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आज भारतीय समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ सब भारतीय होकर भी अलग अलग धर्म और जातियों में बटे हुए हैं | बटे हुए ये पहले भी थे लेकिन आज-कल चल रही आरक्षण की आग ने इन धर्म और जातियों को और दूर - दूर कर दिया है | जिस आरक्षण की शुरुआत सभी भारतीयों को एक स्तर पर लाने के लिए की गयी थी, वही आरक्षण अब आपसी द्वेष का कारण बन गया है | आज से ५० या १०० वर्ष पहले जो स्तिथि थी, अब वो नहीं है. आज एक ब्राह्मण सेना में काम कर रहा है, तो कहीं एक क्षत्रिय शिक्षक का कार्यभार संभाल रहा है | अब जातिगत आधार पर काम का बटवारा न के बराबर रह गया है | फिलहाल चल रहे आरक्षण से एक ही परिवार के सभी व्यक्ति सरकारी नौकरी पर हैं, तो दूसरी ओर उसी जाती के परिवार से कोई भी सरकारी नौकरी पर नहीं है | जिस प्रकार प्रधानमंत्री जी ने गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील करी है, उसी प्रकार सक्षम परिवारों से आरक्षण छोड़ने की अपील भी करनी चाहिए | आज एक MP या MLA का बच्चा अगर आरक्षण के आधार पर कॉलेज में एडमिशन लेता है तो उसे रोकने के लिए कोई कानून नहीं है | कुछ निम्न जाती के लोगों का यह कहना है की हमारे पूर्वजों के ऊपर उच्च जाती वालों के...

रेप की घटनाएं आखिर बढ़ क्यों रही हैं ?

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रेप की घटनाएं आखिर बढ़ क्यों रही हैं ? कौन जिम्मेदार है इस चीज़ का ? कोई कहता है सरकार जिम्मेदार है ! कोई कहता है पुलिस निकम्मी हो गयी है ! कोई कहता है पश्चिमी मानसिकता का असर है ! कोई बॉलीवुड को कोसता है ! कोई लड़कियों को ही जिम्मेदार मानता है ! हर व्यक्ति का अलग निष्कर्ष होगा | यही नहीं हर किसी के पास इस चीज़ को रोकने का उपाय भी होगा | अब उपाय भी सुन लीजिये |

अपने बच्चों को लेड के जहर से बचाएं (Lead Poisoning)

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क्या आपको पता है कि जो पेंट हम घर की दीवारों पर इस्तेमाल करते हैं उसमें मिश्रित लेड (Lead) हमारे बच्चों के लिए कितना नुकसानदायक होता है | आम तौर पर इस चीज़ के बारे में किसी को पता ही नहीं होता | आजकल हम सब सिर्फ बाहरी वातावरण में हो रहे प्रदुषण के बारे में बातें करते हैं, और अपने घर की हवा को बिलकुल साफ़ समझते हैं | जबकि असलियत इस से काफी अलग है | आगे बढ़ने से पहले आपको लेड (Lead) से बच्चों को होने वाले नुकसानों के बारे में बताते हैं | लेड से बच्चों के दिमागी विकास में रूकावट आती है | कई बार ये रूकावट ऐसी होती है जिसे दवाइयों से भी ठीक नहीं किया जा सकता | लेड के जहर से बच्चों में हमेशा के लिए कम बौधिक क्षमता हो जाती है | बच्चों की कुछ नया सीख पाने की क्षमता भी खत्म हो जाती है | लेड से सिर्फ बच्चों को ही नहीं बड़ों को भी नुक्सान होता है | उन्हें हाई ब्लड प्रेशर , सर दर्द या याददाश्त कमज़ोर होने जैसी बीमारियाँ लगने की पूरी सम्भावना रहती है | लेड किस तरह हमारे और बच्चों के शारीर में पहुचता है लेड सांस के जरिये या दीवारों की पपड़ी खाने से बच्चों के शारीर में पहुचता है | छोटे बच्चे...

वोट डालने से पहले अवश्य पढ़ें

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आज के समय की सबसे बड़ी व्यथा यह है की आप Online Shopping करने से पहले एक जैसे दिखने वाले चार products को compare करते हो, फिर reviews पढने के बाद COD वाला order place करते हो | किन्तु !!!!! चुनाव के समय नेता का चुनाव करने से पहले आप उन नेताओं को compare नहीं कर सकते, जिनमें से कोई एक अगले पांच साल तक विधानसभा या लोकसभा में आपकी नुमाइंदगी करेगा | वैसे आज के डिजिटल युग में कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, लेकिन फिर भी इन नेताओं से सम्बंधित जानकारियां जुटाना इतना भी सरल नहीं है | नेताओं को compare करना तो काफी टेढ़ी खीर है | Election Commission की वेबसाइट पर आप अपने क्षेत्र के सभी प्रत्याशियों का affidavit देख सकते हैं, जो वे अपने हाथ से भर कर जमा करते हैं | यदि आप इन affidavits को एक-एक करके पढ़ते हैं तो काफी ज्यादा समय लगता है , क्योंकि हर affidavit लगभग १५ पन्नों की एक PDF फाइल के रूप में होता है | अब यदि आपको अपने क्षेत्र के दस उम्मीदवारों के बारे में जानना है तो आपको लगभग 150 पन्नों की किताब पढनी पड़ेगी, और compare यानि "तुलना" करने में जो समय लगेगा सो अलग |  ये तथ्य जानते हुए भी मैंने...

How many PLANETS were discovered without Telescope

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6 Planets - Mercury, Venus, Earth, Mars, Jupiter and Saturn were discovered without using any telescope. Exact source is there discoveries are unknown as they were visible in night sky if anyone carefully observes them. Last three planets Uranus, Neptune and Pluto were discovered in 19th and 20th century using telescopes. If you are interested in the knowledge of space, stars and planets then the historical facts about discovery of these planets with naked eye might surprise you. Today nobody would like to search for planets in the sky without a powerful telescope. But there was a time when there was no telescope but curiosity to find something special in the sky. People tried to calculate future by looking at the positions of stars in the night sky. In order to do so, some ancient astrologers and mathematicians discovered the planets without any powerful equipment to do that. History of Discovery of First Six Planets of Solar System Around 2nd millennium BC , Mercury, Venus, Mar...

Every Year Divisible by 4 is not a LEAP YEAR ! Why ?

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Most of us believe that if an year is divisible by 4 then it is a leap year. But it is not ? The proof of this statement is that year 1700, 1800 an 1900 were not leap year. But year 2000 was a leap year. How is it so ? It is because our most believed definition of leap year is incomplete. The complete definition of leap year will certainly enlighten you, and once you know the reason behind that definition, you will feel the mathematicians born centuries ago have really done some tremendous calculations to make a scientific calendar for our usage. Definition of Leap Year An year divisible by four is a leap year, except those which are divisible by 100. But those years which are divisible by 400 will be a leap year. Note : Most of us believe that actual length of an year is 365 days and 6 hours. Normal year have 365 days, while the remaining 6 hours of each year creates one complete day in the 4th year. But the truth is that one solar year is 365 days 5 hours 48 minutes 46 sec...

Why do we add extra LEAP DAY in February ?

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Why not in December ? This thought often came in my mind " Why do we add extra leap day in month of February ? ". According to common sense, anything extra should be added in the end, i.e. the month of December. Then why are we adding it in Feb. Some people give false explanation, that it is added in Feb because this month has got lowest number of days i.e. 28. Again it arises one more question, " Why February has got lowest number of days ? " . Answer to both of these questions are connected. Before we go to the answer just think about it that we have got 12 months to divide 365 days (except leap years). It gives us an average of 30.42 days in each month. So mathematicians should have decided to keep alternate months of 30 and 31 days to keep the calendar simpler. But sometime historical facts are not as simple as they seems to be. To get an answer to above questions you need to understand both history and mathematics of modern calendar. History of Modern Cale...

Why do we celebrate NEW YEAR on 1st January ?

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The month of January and February were the months created in the end. Roman calendar which is considered as origin of modern Gregorian calendar had only 10 months starting from March to December. If you take a close look at names of  month September, October, November and December, you will find that their names mean 7, 8, 9 and 10 respectively. So it is for sure that month of Jan and Feb were added in the end. But if it is so then Why do we celebrate New Year on 1st January?  According to common sense we should celebrate it on 1st March. The answer to this question is again in some historical facts that we are going to tell you. In our last article we discussed the reason behind adding leap day at the end of Feb . Now we are taking that knowledge a little further and finding the reason behind celebrating 1st Jan as New Year. Why do we celebrate New Year on 1st January ? According to historical facts Julius Caesar changed the calendar rules and invented his own Julian Cal...