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Vedic Maths - Addition (with Calculator)

Number 1: Number 2: Show Steps of Calculation     Steps of Calculation : Click "Next Step" to show steps. Addition is one of the simplest concepts of mathematics. Here we have provided a calculator that can perform addition using the concept of vedic mathematics. We can't say that here vedic-mathematics will do it any faster, but still it is a better addition calculator. You can try to know it.  Why this addition calculator is better ? Normal calculator can't perform addition of numbers, if the number of digits is more than 32 or 64. But this calculator has no such limitations. When you calculate using the normal addition method, you get the result from the right-most digit to leftmost-digit. But using this vedic-mathematics addition calculator, you get the result from leftmost-digit to rightmost-digit. Some of you might say that this is not a benefit, but we all know that we read numbers from left to rig...

रामायण के पहले श्लोक का रहस्य

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रामायण का पहला श्लोक केवल रामायण ही नहीं अपितु संस्कृत भाषा का भी पहला श्लोक है | इसे लिखने वाले ऋषि वाल्मीकि पहले रत्नाकर नाम के डाकू हुआ करते थे , किन्तु देव-ऋषि नारद की प्रेरणा से उनका ह्रदय परिवर्तन हुआ और वे एक महान ऋषि बने | गंगा स्नान के लिए जाते समय उन्हें तमसा नदी का स्वच्छ पानी देख कर स्नान करने का मन हुआ | वे स्नान कर ही रहे थे जब उन्हें क्रोंच पक्षी का एक जोड़ा प्रेम-मग्न दिखाई पड़ा, जिसे देख कर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई | तभी एक तीर उनमें से नर पक्षी को आ लगा और उसके वियोग में मादा पक्षी विरह वेदना में तड़पने लगी | एक बहेलिये को पास आता देख ऋषि वाल्मीकि समझ गए की यह इसी मनुष्य का कृत्य है | क्रोध व् दुःख के वशीभूत होकर उनके मुख से उस निषाद के लिए श्राप के रूप में ये संस्कृत श्लोक निकला | मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम् ॥ अर्थात्: हे निषाद ! तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा। कुछ समय पश्चात जब ऋषि वाल्मीकि ने रामायण ग्रन्थ की रचना करी त...

मां काली की उत्पत्ति कैसे हुई ?

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 " काली " शब्द को आमतौर पर केवल काले रंग से जोड़ कर समझा जाता है, किन्तु देवी काली का वास्तविक अर्थ काले रंग से कहीं अधिक है | "काली" शब्द "काल" शब्द का स्त्रीलिंग शब्द है| "काल" शब्द भगवान् शिव का ही नाम है , जिन्हें हम महाकाल व् कालभैरव जैसे नामों से भी जानते हैं | काल का अर्थ "मृत्यु" व् "समय" होता है | भगवान् शिव केवल मृत्यु के देवता नहीं बल्कि त्रिकालदर्शी भी हैं, अर्थात वे भूत-भविष्य-वर्तमान को भी देख सकते हैं | भगवान् शिव की शक्ति ही "काली" हैं | शक्ति ही जीव को प्राण देती है व् वही मृत्यु भी है | काली वह शक्ति है जो सृष्टि के उत्पन्न होने से पूर्व अन्धकार में भी व्याप्त थी और सृष्टि के अंत के पश्चात भी उसी घने काले अन्धकार में भी होगी | यूं तो काली सदा से हैं, और सदा रहेंगी , किन्तु उनके मूर्त रूप में आने के पीछे कई कथाएँ प्रचलित हैं | दारुक वध कथा  दारुक नाम के असुर ने ब्रह्मा को प्रसन्न कर के वरदान लिया की उसका वध केवल किसी स्त्री के हाथों ही हो | यह वरदान उसने इस घमंड में लिया की कोई स्त्री भला कैसे उसका वध...

धार्मिक दंगों का असली कारण !

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सभी धर्म शांति की शिक्षा देते हैं, फिर भी आज तक दुनिया में सबसे ज्यादा झगडे धर्म के नाम पर ही हुए हैं | ऐसा क्या है सभी धर्मों की शिक्षा में जो व्यक्ति धर्म के नाम पर एक-दूसरे की गर्दन काटने से भी नहीं कतराता |  धार्मिक श्रेष्ठता  सभी धर्मों के लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ समझते हैं, जो काफी हद तक उचित भी है | लेकिन यह श्रेष्ठता का भाव जब तक गर्व की सीमा तक है, तो सही है | किन्तु यदि यह श्रेष्ठता का भाव घमंड बन जाए तो बात बिगड़ जाती है | अपने धर्म पर गर्व यदि सीमा से अधिक हो जाए तो घमंड बन जाता है, जो दूसरे के धर्म को निम्न सिद्ध करना चाहता है | यह घमंड अपने भगवान् को सच्चा मानता है, और दूसरे के भगवान् को झूठ | धर्मान्तरण  दूसरे धर्म के लोगों को अपने धर्म में शामिल कराना "धर्मान्तरण" कहलाता है | मुस्लिम और इसाई धर्म में धर्मान्तरण को अच्छा व् सही माना जाता है , किन्तु हिन्दू धर्म में ऐसा नहीं है | यहीं से धार्मिक श्रेष्ठता सिद्ध करने की होड़ शुरू होती है | आप अपने धर्म को उच्च और दूसरे के धर्म को तुच्छ साबित करके ही किसी व्यक्ति को अपने धर्म में मिला सकते हैं | यहीं से धार्मिक ...

शिव सूत्र : 1 - 9 स्वप्नो विकल्पाः

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  स्वप्नो विकल्पाः   [ शिव सूत्र : 1 - 9] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का नौवां सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  : विकल्प ही स्वप्न हैं | भावार्थ  : विकल्प वह स्तिथि है जो हो सकती थी किन्तु हुई नहीं | विकल्प भविष्य और भूत दोनों के सन्दर्भ में हो सकते हैं | हमारे मन अथवा चित्त में ये विकल्प सदा रहते हैं | सोते समय यही हमें स्वप्न के रूप में दिखते हैं, किन्तु यदि आप यह सोचते हैं की दिन में जाग्रत अवस्था में आप इन स्वप्नों से दूर हो जाते हैं तो यह आपका भ्रम है | दिन में भी हम ज़्यादातर समय भूत अथवा भविष्य के सन्दर्भ में ही सोचते हैं | रात के समय हमारे मन में मौजूद विकल्प ही मूर्त रूप में स्वप्न के रूप में दिखते हैं | कभी यह स्वप्न हमारे भय से प्रेरित होते हैं, तो कभी प्रेम से, तो कभी वासना से , कभी बीते हुए कल से, तो कभी आने वाले कल से |  रात के समय जो तारे आपको आकाश में दिखते हैं, वे दिन में भी वहीँ होते हैं, किन्तु सूर्य के प्रकाश में धूमिल होकर नहीं दिखते| यदि आप एक गहरे कूए में उतर कर आकाश में देखें तो वह आपको दिन में भी दिख जायेंगे | ठीक इसी प्रकार आप सदैव स्वप्न अर...

शिव सूत्र : 1 - 8 ज्ञानं जाग्रत्

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  ज्ञानं जाग्रत्   [ शिव सूत्र : 1 - 8] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का आठवा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  : ज्ञान का बना रहना ही  जाग्रत  अवस्था है | भावार्थ  : साधारण जाग्रत अवस्था तक हम नींद से उठने पर पहुँच जाते हैं, किन्तु पूर्ण जाग्रत अवस्था तक हमें केवल हमारा ज्ञान पहुंचा सकता है | शिव सूत्र के प्रथम अध्याय के दूसरे सूत्र के अनुसार "ज्ञानं बन्धः" अर्थात ज्ञान बंधन है, किन्तु यही ज्ञान हमें उस बंधन से मुक्त कर के पूर्ण जागृति तक पहुचाने का सामर्थ्य भी रखता है | पूर्ण जाग्रत अवस्था केवल शरीर का जागरण नहीं है, अपितु हमारे अंतर्मन, आत्मा व् चेतना का जागरण है | हमारा ज्ञान हमें केवल भौतिक जगत का बोध नहीं कराता, ज्ञान हमें स्वयं को पहचानने का अवसर भी देता है | हमारा सारा ज्ञान हमारी इन्द्रियों द्वारा एकत्र किया गया होता है, इन्द्रियां हमें बहुत कुछ देखने और समझने में मदद करती हैं, किन्तु उनकी भी एक सीमा होती है | हमारा ज्ञान ही हमें यह समझने में मदद करता है कि कुछ है जो इन इन्द्रियों से परे है |  उदाहरण के तौर पर हम मैग्नेटिक तरंगों को...

धर्म का अपमान : क्यों और कब तक

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खुद को सही साबित करने के दो तरीके होते हैं -  पहला यह की कुछ अच्छे तर्कों के साथ अपनी बात बात को सही साबित किया जाए | दूसरा यह की सामने वाले को गलत साबित कर दिया जाए, भले ही वह गलत तर्कों से हो | जब ज्ञानव्यापी में मिली आकृति को हिन्दू पक्ष शिवलिंग , और मुस्लिम पक्ष फव्वारा बता रहा था, तब कुछ लोगों ने बहुत सी अनाप-शनाप चीज़ों को शिवलिंग बता कर हिन्दू धर्म को मज़ाक उडाना शुरू कर दिया | हालांकि यह कोई नयी बात नहीं है | अपने अल्लाह को सही साबित करने के लिए ये लोग हमारी मूर्तियों को "बुत" और उन मूर्तियों के उपासकों को "बुतपरस्त" बोलते आ रहे हैं | हिन्दू ने कभी अल्लाह के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठाया क्योंकि उस अल्लाह की व्याख्या हमारे "निराकार भगवान्" से मेल खाती है, जिसे हम निर्गुण परमात्मा या शून्य स्वरुप मानते हैं | किन्तु अपने अल्लाह को सही साबित करने के चक्कर में (जो करने की जरूरत है ही नहीं ), जब आप दूसरे के भगवान् को गलत साबित करने में लग जाते हैं, तभी आप गलत हो जाते हैं | रही बात शिवलिंग और फव्वारे की तो वो तय करने के लिए न्यायालय है | न्यायालय कोई धार्म...