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कालभैरवाष्टकम् with Audio (काल भैरव अष्टकम्)

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"कालभैरवाष्टकम्" संस्कृत भाषा में रचित नौ श्लोकों का समूह है , जिसे आदि-शंकराचार्य द्वारा रचा गया था | प्रथम आठ श्लोकों में भगवान् कालभैरव की स्तुति एवं गुणों का वर्णन है तथा एक फल श्रुति श्लोक है | कालभैरव भगवान् शिव का ही रुद्रावतार रूप है और भगवान् शिव के रक्त से इनकी उत्पत्ति हुई है | काशी नगरी को काल भैरव का मुख्य निवास स्थान माना जाता है | मान्यता है की भगवान् काल भैरव समस्त पापों का दंड दे कर आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति देते हैं | पहली बार पढने पर यह थोडा कठिन प्रतीत होता है, इसलिए यहाँ पर एक "सरल" का बटन दबा कर आप इन श्लोकों को सरल शब्दों में संधि-विच्छेद कर के पढ़ सकते हैं और साथ ही प्रत्येक श्लोक का अर्थ भी जान सकते हैं | कालभैरवाष्टकम् Your browser does not support the audio element. Your browser does not support the audio element. Speed: हिंदी अर्थ :       क्या आप इस "कालभैरवाष्टकम्" को लगातार सुनना चाहते हैं ? यदि "हाँ" तो कितनी बार :

क्या आप गलत तरीके से सांस ले रहे हैं ?

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हमारा सांस लेने का गलत तरीका हमारे तनाव में रहने का एक मुख्य कारण है ।  हम "6-pack-abs" के युग में रह रहे हैं, जहां आपके पेट की muscles को दिखाना आपकी fitness का प्रमाण है। Fitness freak, विशेष रूप से पुरुष, अपने पेट को अंदर खींचते हैं और अपनी छाती को बड़ा दिखाने के लिए सांस लेते हैं। Fitness के इन तथाकथित प्रमाणों ने हमारे सांस लेने के तरीके को बदल दिया है । यह वयस्कों में बढ़ती चिंता और तनाव (stress and anxiety) के पीछे एक प्रमुख कारण है। कौनसी Muscles हमें सांस लेने में मदद करती हैं ? सांस लेना केवल Lungs (फेफड़ों) का फैलना और सिकुड़ना नहीं है । इस प्रक्रिया में हमारी muscles (मांसपेशियों) का काफी बड़ा योगदान होता है । हमारे diaphragm, abdomen और पसलियों के बीच की muscles, सांस लेने में लगने वाले जोर का 80% भार वहन करती हैं । बाकी का 20% भार हमारे कंधे, गर्दन और उपरी छाती की muscles अपने ऊपर लेती हैं । गलत तरीके से सांस लेने से हम तनाव में कैसे आ जाते हैं ? कुछ लोगों का यह मानना है की हमारी कमर बिलकुल पतली होनी चाहिए और साथ ही पेट की muscles (6-pack-abs) भी दिखनी चाहिए । यह मा...

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You must have received such messages in your message box. Different languages are used to make people forward such messages. Some of these messages ask you to forward it to at least 10 people. People usually don't know why they read such messages and why they forward them. Some of these messages utilize the greed in the mind of reader, while some of them use the "fear of God" to make people forward them. Why do people write and send such messages ? To popularize a religion. To make people fearful of God. Both of the above motives can be easily understood but the truth is that the sender of such messages neither know the religion properly nor the God. According to me, originator of such messages needs some kind of treatment from a psychiatrist. Why you should not forward such messages ? You should not forward such messages because it shows that either you are greedy or fearful. Being greedy is not a bad thing, as long as it gives you motivation to do something go...

शिव सूत्र : 1 - 7 जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः

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  जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः   [ शिव सूत्र : 1 - 7] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का सातवां सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  :  जाग्रत  अवस्था ,  स्वप्न  अवस्था और  सुषुप्त  अवस्था के भेद को जो जान लेता है , वही  तुर्यावस्था  को भोग सकता है | भावार्थ  : साधारण मनुष्य केवल तीन अवस्थाओं को जानता है , जाग्रत अवस्था  (जागना), स्वप्नावस्था (जब हम स्वप्न देखते हैं ) और सुषुप्त अवस्था (जब हम गहरी नीद में होते हैं )| इस सूत्र में भगवान् शिव हमारी जागृति की चार अवस्थाएं बताते हैं | चौथी अवस्था केवल योगियों को ही ज्ञात होती है, जिसे तुर्यावस्था कहा जाता है | इस चौथी अवस्था को जानने के लिए आपको पहले की तीनो अवस्थाओं को समझना ज़रूरी है | सामान्य  जाग्रत अवस्था  वो है जब हमें संसार का ज्ञान होता है किन्तु स्वयं का नहीं | इस अवस्था में हम शरीर के बाहर तो झाँक सकते हैं किन्तु अन्दर नहीं | ये अवस्था जाग्रत होते हुए भी हम उस स्वयं से अनभिज्ञ रह जाते हैं जो सबसे ज्यादा जानने योग्य है | इस अवस्था में हम जाग्रत होते हुए भी अपने ...

शिव सूत्र : 1 - 6 शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः

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  शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः   [ शिव सूत्र : 1 - 6] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का छठा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  :  शक्ति  अर्थात शिव का वो अभिन्न हिस्सा जो इस जगत को चला रहा है | चक्र  अर्थात एक गोला |  संधान  शब्द के कई अर्थ हैं जैसे धनुष पर बाण चढ़ाना , निशाना लगाना या मिलाना |  विश्वसंहारः  अर्थात इस संसार का संहार या अंत | भावार्थ  : समस्त जगत की शक्ति जो शिव का ही एक अभिन्न अंग है और इस जगत को स्वरुप प्रदान किये हुए है, जब वह समस्त शक्तिचक्र एक जगह इकठ्ठा होता है , तब जगत का संहार होता है | शिव का कार्य ही संहार है | जो भी चीज़ उत्त्पन्न हुई है , उसका संहार भी अवश्यम्भावी है | ये समस्त ब्रह्माण्ड भी इसी नियम से बंधा हुआ है | शिव इसका भी संहार करते है | समस्त ब्रह्माण्ड शिव की शक्ति का ही विस्तार है , जब ये समस्त शक्ति एक चक्र बना कर इकट्ठी होती है , तब विश्व का संहार होता है | इस के अलावा इस सूत्र का एक और भाव भी है | हमारे शरीर में भी कुछ चक्र होते हैं जिन्हें योग के माध्यम से जाग्रत किया जा सकता है | ये चक्र न सिर्फ शक्ति क...

शिव सूत्र : 1 - 5 उद्यमो भैरवः

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  उद्यमो भैरवः   [ शिव सूत्र : 1 - 5] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का पांचवा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  :  उद्यम  अर्थात एक सार्थक प्रयास |  भैरव  - शिव का एक रूप जो अत्यंत भयानक है | इस सूत्र का शाब्दिक अर्थ यह है की एक आध्यात्मिक सार्थक प्रयास से ही हम भैरव स्वरुप को समझ सकते हैं | भावार्थ  : शिव सूत्र का हर सूत्र अपने से पिछले और अगले सूत्र से जुड़ा हुआ है | पिछले सूत्र में ये बताया गया था की यह सांसारिक ज्ञान केवल स्वर है, जो हमें जीवन भर अपने नियंत्रण में रखता है | इस सूत्र में थोडा आगे बढ़कर एक सार्थक प्रयास करने की बात कही गयी है , जिससे हम इस माया से मुक्त हो कर उस भैरव स्वरुप को जान सकें | भैरव संहार करते हैं | इसीलिये शिव को काल भैरव भी कहा गया है | वे संहार के देवता हैं | हर जीव और वस्तु की एक आयु है , उसके बाद उसकी मृत्यु या संहार निश्चित है | जो इस मृत्यु को समझ गया , उस भैरव को समझ गया , वही सांसारिक ज्ञान (जो माया है ) से मुक्त हो सकता है | उस भैरव का जानना इतना सरल भी नहीं है | जो सार्थक प्रयास इस भैरव को जानने के लिए करना पड़ता है , व...

शिव सूत्र : 1 - 4 ज्ञानाधिष्ठानं मातृका

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  ज्ञानाधिष्ठानं मातृका   [ शिव सूत्र : 1 - 4] यह शिव सूत्र के प्रथम अध्याय का चौथा सूत्र है | शाब्दिक अर्थ  :  ज्ञान  अर्थात सांसारिक वस्तुओं की जानकारी जिसकी एक सीमा है |  अधिष्ठानं  का अर्थ जिसके अधीन रह कर कोई कार्य किया जाए |  मातृका  शब्द के कई अर्थ हैं - जननी, सौतेली माँ, माँ जैसी, ठोड़ी की आठ विशिष्ट नसें , स्वर और संस्कृत भाषा (जो सब भाषाओँ की जननी है ) | संसार में प्राप्त ज्ञान ही हमें अपने अधीन रखता है , और वही हमारे मुख से भाषा के माध्यम से निकलता है | भावार्थ  : हम जब से इस संसार में जन्म लेते हैं केवल इस संसार का ही ज्ञान प्राप्त करते हैं | हम सभी जाने अनजाने इस ज्ञान के अधीन अपना जीवन व्यतीत करते हैं | यही ज्ञान शब्दों के माध्यम से हमारे मुख से निकलता है | ज्ञानाधिष्ठानं  का अर्थ बड़ा गहरा है, हमारा ज्ञान ही हमारे सभी कर्मों का स्रोत है| यह ज्ञान ही हमारा आधार है, यही हमें अपने वशीभूत रखता है , और हम इस भ्रम में जीते हैं की हम स्वतन्त्र हैं | सांसारिक ज्ञान की एक सीमा है | संसार का कोई भी ज्ञान शिव को व्यक्त करने में अ...